आचार्य जे. बी. कृपलानी और भारतीय संसदीय लोकतंत्र: विपक्ष, जवाबदेही, असहमति और नागरिक स्वतंत्रता का ऐतिहासिक अध्ययन

Subject area: Social Sciences DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.22914261

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Abstract

आचार्य जे. बी. कृपलानी स्वतंत्र भारत के उन प्रमुख नेताओं में थे जिन्होंने सत्ता से बाहर रहते हुए संसदीय लोकतंत्र, राजनीतिक जवाबदेही और नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्नों को लगातार उठाया। कांग्रेस के लंबे संगठनात्मक अनुभव, 1946–47 की अध्यक्षता, स्वतंत्रता के बाद पार्टी-सरकार संबंधों पर मतभेद, कांग्रेस से अलगाव, किसान मजदूर प्रजा पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ाव, संसद में सक्रिय हस्तक्षेप, 1963 के प्रथम अविश्वास प्रस्ताव तथा 1975–77 के आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों की रक्षा से उनका राजनीतिक जीवन जुड़ा रहा। प्रस्तुत शोध-पत्र कृपलानी की भूमिका को किसी राजनीतिक पक्ष की प्रशंसा या आलोचना के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र के संस्थागत विकास के ऐतिहासिक संदर्भ में विश्लेषित करता है। अध्ययन का आधार संबंधित शोध-प्रबंध तथा भारतीय पार्टी-व्यवस्था, संसदीय विपक्ष, आपातकाल और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर उपलब्ध शोध-पत्र हैं। लेख का तर्क है कि कृपलानी की संसदीय विरासत को चार आयामों में समझा जा सकता है: पार्टी और सरकार के संबंधों पर बहस, विपक्ष की वैधता और भूमिका, संसद के माध्यम से कार्यपालिका की जवाबदेही, तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा। साथ ही उनकी राजनीति की सीमाओं—कमज़ोर चुनावी आधार, वैचारिक गठबंधनों की कठिनाइयाँ और आदर्शवाद तथा व्यावहारिक राजनीति के बीच तनाव—पर भी चर्चा की गई है।

Keywords

जे. बी. कृपलानीसंसदीय लोकतंत्रविपक्षअविश्वास प्रस्तावनागरिक स्वतंत्रताकांग्रेस प्रणालीआपातकाल

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प्रीति, डॉ. कुमारी सुमन (2026). आचार्य जे. बी. कृपलानी और भारतीय संसदीय लोकतंत्र: विपक्ष, जवाबदेही, असहमति और नागरिक स्वतंत्रता का ऐतिहासिक अध्ययन. International Innovations & Scholarly Trends Journal, 2(6), 4298–4306. https://doi.org/10.5281/zenodo.22914261

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