Abstract
आचार्य जे. बी. कृपलानी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन नेताओं में थे जिनकी राजनीतिक पहचान केवल कांग्रेस संगठन या स्वतंत्रता संघर्ष तक सीमित नहीं रही। स्वतंत्रता के बाद उनके विचार विशेष रूप से ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण, छोटे और कुटीर उद्योग, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक समानता तथा नैतिक राजनीति के प्रश्नों पर अधिक स्पष्ट होकर सामने आए। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य कृपलानी के गांधीवादी समाजवाद और विकेंद्रीकृत विकास संबंधी विचारों का विश्लेषण करना है। अध्ययन का आधार शोध-प्रबंध में उपलब्ध वैचारिक विवेचन, कृपलानी के राजनीतिक हस्तक्षेपों का ऐतिहासिक संदर्भ तथा गांधीवादी लोकतंत्र और ग्रामीण विकास पर उपलब्ध शोध-साहित्य है। लेख यह दिखाता है कि कृपलानी ने गांधी के विचारों को यांत्रिक रूप से नहीं अपनाया, बल्कि उन्हें स्वतंत्र भारत की नई राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के संदर्भ में पुनः व्याख्यायित किया। उनके लिए ग्राम स्वराज केवल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण नहीं था; यह स्थानीय समुदायों की निर्णय-क्षमता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, उत्तरदायित्व और सामाजिक न्याय से जुड़ा व्यापक विचार था। नेहरू के केंद्रीकृत औद्योगिक विकास मॉडल से उनका मतभेद इसी वैकल्पिक दृष्टि से जुड़ा था। लेख अंत में इस बात पर विचार करता है कि पंचायती राज, स्थानीय भागीदारी, टिकाऊ विकास और ग्रामीण रोजगार की समकालीन बहसों में कृपलानी की विचारधारा को किस सीमा तक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक संदर्भ के रूप में पढ़ा जा सकता है।
Keywords
जे. बी. कृपलानीगांधीवादग्राम स्वराजविकेंद्रीकरणगांधीवादी समाजवादग्रामीण विकासनैतिक राजनीति
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प्रीति, डॉ. कुमारी सुमन (2026). आचार्य जे. बी. कृपलानी का गांधीवादी समाजवाद, ग्राम स्वराज और विकेंद्रीकरण: स्वतंत्र भारत के विकास-विमर्श का एक वैकल्पिक दृष्टिकोण. International Innovations & Scholarly Trends Journal, 1(1), 60–66. https://doi.org/10.5281/zenodo.22913889
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