Author(s)

Mr. Hanuman Prasad, Dr. Gaurav Kumar Sharma

  • Manuscript ID: 121064
  • Volume 2, Issue 6, Jun 2026
  • Pages: 4283–4290

Subject Area: Social Sciences

Abstract

भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए क्षेत्रीय विविधताओं और आवश्यकताओं का संतुलित विकास सुनिश्चित करना है। समय के साथ बदलती आर्थिक परिस्थितियों, वैश्वीकरण, उदारीकरण तथा विकास की बढ़ती आवश्यकताओं के कारण केंद्र–राज्य संबंधों की प्रकृति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2015 में योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य एक अधिक सहभागी, लचीली और समन्वयात्मक नीति-निर्माण प्रक्रिया को बढ़ावा देना था।
नीति आयोग को एक ‘थिंक टैंक’ के रूप में स्थापित किया गया है, जो केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ाने, नीति निर्माण में राज्यों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने तथा “बॉटम-अप” दृष्टिकोण को अपनाने पर बल देता है। यह परिवर्तन पारंपरिक केंद्रीकृत योजना प्रणाली से हटकर सहकारी संघवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
यह शोध-पत्र नीति आयोग की भूमिका, सहकारी संघवाद की अवधारणा तथा राजस्थान के संदर्भ में राज्य स्वायत्तता के उभरते आयामों का विश्लेषण करता है। विशेष रूप से यह अध्ययन इस बात पर केंद्रित है कि किस प्रकार नीति आयोग ने राज्यों को नीति निर्माण में अधिक भागीदारी का अवसर प्रदान किया है और किस हद तक यह व्यवस्था राज्यों की स्वायत्तता को सुदृढ़ करने में सफल रही है।
अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नीति आयोग ने राज्यों के साथ संवाद और सहभागिता को बढ़ाकर सहकारी संघवाद को मजबूत करने का प्रयास किया है। राज्यों को अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार सुझाव देने और योजनाएँ बनाने का अवसर मिला है, जिससे नीति-निर्माण अधिक व्यावहारिक और समावेशी बना है। राजस्थान जैसे राज्य, जहाँ जल संकट, ग्रामीण विकास, पर्यटन और औद्योगिक असंतुलन जैसी विशिष्ट चुनौतियाँ हैं, के लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुई है।
हालाँकि, इसके बावजूद राज्यों की पूर्ण वित्तीय स्वायत्तता अभी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। संसाधनों के आवंटन और वित्तीय नियंत्रण के मामलों में केंद्र की भूमिका अब भी प्रमुख बनी हुई है, जिससे राज्यों की निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है। अतः आवश्यकता है कि सहकारी संघवाद को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए वित्तीय विकेंद्रीकरण और संस्थागत सुदृढ़ीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाए।

Keywords
सहकारी संघवादनीति आयोगराज्य स्वायत्तताकेंद्र–राज्य संबंधवित्तीय विकेंद्रीकरण